Saturday , September 26 2020

संत कबीर दास ने ऐसे समझाया जीवन मे मेहनत का मोल

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोई ।
जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय ॥
संत कबीर दास जी के दोहे आज भी जीवन को नई प्रेरणा देते हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सुधार में लगा दिया। वह 15वीं सदी के रहस्यवादी कवि और संत थे। वह धर्म निरपेक्ष थे। उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांड, अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की आलोचना की।
वह निरक्षर थे। उन्‍हें शास्त्रों का ज्ञान गुरु स्‍वामी रामानंद द्वारा प्राप्‍‍त हुआ। उनके नाम पर कबीरपंथ भी प्रचलित है। उनकी रचनाएं रहस्यवाद और भक्ति से संबंधित हैं। उन्होंने संयम का जीवन जीने का विकल्प चुना।
एक बार धनाड्य परिवार का युवक उनके पास आया और पूछने लगा कि यह साड़ी कितने की है। संत कबीर ने कहा कि 10 रुपये की। उसने साड़ी के दो टुकड़े कर दिए और एक टुकड़े का दाम पूछा। इस पर कबीर दास जी ने कहा कि 5 रुपये। युवक साड़ी के टुकड़े करता गया और दाम पूछता गया। आखिर में बोला कि यह टुकड़े मेरे किस काम के। इस पर कबीरदास जी ने कहा कि यह तुम्हारे क्या अब किसी के काम के नहीं रहे। इस पर युवक उन्हें पूरी साड़ी के पैसे देने लगा और बोला कि तुम यह घाटा कैसे सहोगे। नुकसान मैंने किया है तो घाटा भी मुझे ही पूरा करना होगा। संत कबीरदास ने कहा कि तुम यह घाटा पूरा नहीं कर सकते। किसान का श्रम लगा तब कपास पैदा हुई। मेरी स्त्री ने मेहनत से उस कपास को बुना और सूत काता। फिर मैंने उसे रंगा और बुना। इतनी मेहनत तभी सफल होती जब इसे कोई पहनता। पर तुमने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। धन से यह घाटा कैसे पूरा होगा। यह सुनकर युवक संत के पैरों में गिर गया। तब संत कबीरदास ने कहा कि तुम्हारा पश्चाताप ही मेरे लिए बहुत कीमती है।