Friday , September 25 2020

ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘जी 5’ पर रिलीज हुई बाबा आजमी द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्म ‘मी रक्सम’ की समीक्षा

जा हिद-ए-तंग नजर ने काफिर जाना मुझे
काफिर ये समझता है मुसलमां हूं मैं।’
जो भी लोग धार्मिक रुढ़ियों को तोड़ अलग लीक बनाने की कोशिश करते हैं, उन्हें अपने समाज की नाराजगी तो झेलनी ही पड़ती है, दूसरे पक्ष के कुछ ठेकेदार भी उनको उपेक्षा की नजर से देखते हैं। इससे कुछ लोग तो घबराकर हार मान लेते हैं, लेकिन कुछ लोग डटे रहते हैं। ऐसे ही लोग समाज में नई परंपराओं को जन्म देते हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘जी 5’ पर रिलीज हुई बाबा आजमी द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्म ‘मी रक्सम’ इसी का संदेश देती है। इस फिल्म का नाम भी सांस्कृतिक समन्वय का संदेश देता है, जो अंग्रेजी, अरबी-फारसी और संस्कृत की ध्वनियों से युक्त है। यह फिल्म भारत की गंगा-जमुनी तहजीब के खूबसूरत रंगों को पर्दे पर बिखेरती है। यह फिल्म गंगा-जमुनी तहजीब के पैरोकार विख्यात शायर कैफी आजमी को श्रद्धांजलि भी है। कैफी साहब ने एक बार अपने बच्चों शबाना आजमी और बाबा आजमी से अपने गांव मिजवां में फिल्म की शूटिंग की इच्छा व्यक्त की थी। यह फिल्म आजमगढ़ के मिजवां में ही शूट की गई है।
सलीम (दानिश हुसैन) दर्जी है। उसकी पत्नी का देहांत हो चुका है। वह अपनी बेटी मरियम (अदिति सुबेदी) की परवरिश मां और बाप, दोनों की तरह करता है। मरियम भरमनाट्यम डांस सीखना चाहती है। सलीम उसका दाखिला उमा मैडम (सुदीप्ता सिंह) के डांस स्कूल में करा देता है। मरियम डांस में अच्छी है और बहुत जल्दी ही भरतनाट्यम में अच्छा करने लगती है। उमा मैडम उससे बहुत खुश रहती हैं। लेकिन सलीम के समाज के लोगों को यह बात नागवार गुजरती है। मिजवां का मुस्लिम लीडर हाशिम सेठ (नसीरुद्दीन शाह) सलीम से अपनी बेटी को भरतनाट्यम की शिक्षा दिलाने को बंद करने के लिए कहता है, पर सलीम उसकी बात नहीं सुनता। लिहाजा हाशिम के प्रभाव में मिजवां के मुसलमान सलीम की दुकान से कपड़ा सिलवाना बंद कर देते हैं। दूसरी तरफ उमा के डांस स्कूल को फंड मुहैया कराने वाले जयप्रकाश (राकेश चतुर्वेदी ओम) को भी कुछ खास पसंद नहीं है कि एक मुस्लिम लड़की भरतनाट्यम जैसा ‘हिंदू डांस’ करे।
सलीम और मरियम को अपने समाज के साथ परिवार का भी कड़ा विरोध झेलना पड़ता है। मरियम की खाला जेहरा (श्रद्धा कौल), नानी (फारुख जफर) भी उसके भरतनाट्यम सीखने से बहुत खफा हैं, क्योंकि यह उनके मजहब के खिलाफ है। वे उसे भरतनाट्यम सीखना बंद करने को कहती हैं। मरियम चौतरफा विरोध और अपने पिता की तकलीफों से घबराकर एकबारगी टूट जाती है, लेकिन फिर कला को मजहब के आधार पर बांटने वालों के खिलाफ खड़ी हो जाती है। वह भरतनाट्यम सीखना जारी रखने का फैसला करती है…
इस फिल्म की खासियत है कि यह बिना किसी राजनीतिक पचड़े में पड़े बगैर अपनी बात को कहती है और इसी वजह से ज्यादा प्रभावी तरीके से यह7 संदेश देने में कामयाब रहती है कि कला का कोई मजहब नहीं होता। कला बस कला है। फिल्म इस उम्मीद से भी रोशन है कि युवा पीढ़ी इस बंटवारे से इत्तेफाक नहीं रखती। मरियम की मौसेरी बहन कुलसुम (जुहाना अहसान), अशफाक (कौस्तुभ शुक्ला) और जयप्रकाश की बेटी अंजलि (शिवांगी गौतम) इस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिल्म को बहुत सीधे-सादे तरीके से बनाया गया है। न इसमें ड्रामा है, न भारी-भरकम संवाद और न ही स्पेशल इफेक्ट। फिर भी यह प्रभावित करती है। बाबा आजमी का निर्देशन अच्छा है और सिनेमेटाग्राफी भी, जो उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण इलाके को प्रामाणिकता से पेश करती है।
नसीरुद्दीन शाह ऐसे अभिनेता हैं, जिनके बारे में कहा जा सकता है कि ‘बस नाम ही काफी है’ और इस बात को इस फिल्म में छोटी-सी भूमिका में भी वह साबित करते हैं। सलीम के किरदार में दानिश हुसैन का अभिनय सहज है। वह प्रभावित करते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं अदिति सुबेदी। उनका अभिनय भावपूर्ण है और डांस भी बढ़िया है, खासकर क्लाईमैक्स में।