Saturday , December 4 2021

परमहंस आश्रम कैलाशपुरी परसौना में हुआ सत्संग, लोग हुए भावविभोर

विवेक मिश्रा (संवाददाता)
सोनभद्र |घोरावल/शाहगंज परमहंस आश्रम कैलाशपुरी परसौना स्थित परम पूज्य श्री मड़ई महाराज जी ने सत्संग के दौरान बताया की महापुरुषों की वाणी, परमपिता परमेश्वर का चिंतन, करने के बजाए समाज की भ्रांतियों का शिकार होते चले गए, और सबका मालिक एक पथ से विविध रास्तों में जाकर भटक रहे हैं, जबकि भगवान श्रीकृष्ण की वाणी, श्रीमद्भगवद्गीता रूपी यथार्थ गीता में शाश्वत व्याख्या वर्णित है, परमात्मा के प्रति अट्टू श्रद्धा, रखने वालोंं पर परमात्मा की कृपा बरसती चली जाती है, परम पूज्य मड़ई महाराज ने बताया कि आत्मा, अजर, अमर, अविनाशी, है मानव तन पाकर भी ईश्वर पथ से भटक जाना, जो आप अपने लिए एकत्रित कर रहे हैं, वह सब कुछ इसी सांसारिक मोह माया रूपी बंधन की देन है, अपनी आत्मा के लिए मनुष्य कुछ भी नहीं कर रहा है, जबकि महापुरुषों की वाणी, यथार्थ गीता में विधिवत वर्णित है, उन्होंने राजा बलि की कथा का वर्णन करते हुए सत्संग में बताया की उनके दरबार में वामन रूपी भगवान पहुंचे, तो द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया, काफी करने के बाद द्वारपाल राजा बलि से मिलने के लिए ले गए, तब वामन भगवान बोले महाराज आप की दानवीरता दूर- दूर तक फैली हुई है, मैं भी आपसे कुछ मांगना चाहता हूं, राजा बलि ने सोचा वामन अवतार रूपी भगवान ज्यादा से ज्यादा क्या मांग सकते हैं ,उन्होंने कहा महाराज आप सोच समझ लीजिए, मैं आप से मांगने जा रहा हूं, कहीं आप इंकार तो न कर दीजिएगा, राजा बलि से वचन लेने के बाद उन्होंने कहा मुझे 3 पग जमीन दे दीजिए, जब पहला पग में पूरी पृथ्वी नाप लिए, और दूसरा पग में आकाश तब महाराज बलि को यह ज्ञात हुआ यह तो स्वयं वामन रूपी परमात्मा हमारे दरबार में पधारे हैं, तब उन्होंने तीसरे पग में अपना पूरा शरीर नपवा लिया, जब भगवान उन पर प्रसन्न हो गए, तो उन्होंने तीन वरदान मांगने को कहा तब राजा बलि बोले महाराज जब हम आपके और आप हमारे हो गए ,तो फिर मुझे क्या आवश्यकता है कुछ मांगने की, वामन भगवान सोच में पड़ गए ,दूसरे वरदान पर कहा कि प्रभु अब मेरी कुछ इच्छा ही शेष नहीं बची ,और यदि आप कुछ देना भी चाहते हैं, तो सिर्फ इतना दीजिए मेरे इस दरबार में 9 खिड़की सहित एक दरवाजा है मेरी जब भी आंख खुले तब भगवान आप ही का दर्शन हो, भगवान वहीं पर विराजमान होकर पहरा देने लगे, कहने का आशय सिर्फ इतना है परमात्मा सिर्फ भाव के भूखे होते हैं, जहां भी सच्ची, आस्था और श्रद्धा के साथ भक्त भगवान का चिंतन, भजन, किसी तत्वदर्शी महापुरुष के सानिध्य में जाकर बस आरंभ भर कर दे, इस भगवत पथ में बीज का नाश नहीं होता , निस्वार्थ भाव से किया गया सत्संग, महापुरुषों की टूटी फूटी सेवा से ही ढाई अक्षर के ओम, राम, शिव में से किसी एक को साध कर चिंतन में अवश्य बैठे, और यथार्थ गीता का गीतोक्त विधि से श्वास आई तो ओम, गई तो ओम राम नाम की मणि, जिहवा के द्वार पर रख दें, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ,अर्जुन तेल में देखकर अपने बाणों से मछली पर निशाना साधा था, सत्संग के दौरान पूज्यश्री ने बीच-बीच में” जिंदगी एक किराए का घर है, एक दिन छोड़कर जाना पड़ेगा,” मौत जब आवाज देगी ,सब कुछ छोड़कर तुझको आना पड़ेगा”, भजन सुना कर सभी भक्तजनों को भावविभोर कर दिए, अंत में सभी भक्तगण ओम श्री सदगुरुदेव भगवान की जय कहते हुए प्रसाद लेकर अपने-अपने जनपदों की ओर रवाना हो गए।