Saturday , December 4 2021

अड़गड़ानंद महराज के प्रवचन से भक्त गण हुए आनन्दित

विवेक मिश्रा/ संजीव कुमार (संवाददाता)
मीरजापुर|शक्तेशगढ़ मिर्जापुर परमहंस आश्रम शक्तेशगढ़ में शनिवार की सुबह सत्संग के दौरान यथार्थ गीता के प्रणेता योगेश्वर महाप्रभु सदगुरुदेव भगवान स्वामी अड़गड़ानंद जी ने आश्रम में उपस्थित भक्तों को सत्संग के दौरान भजन के चार वृत्तियों में नाम, रूप, लीला और धाम की विधिवत व्याख्या में बताया स्नेह से भगवान का नाम जपने से भगवान हृदय में आ जाते हैं और जब हृदय में आ जाए तो ध्यान पकड़ लेने के पश्चात, व्यक्ति इस अथाह भवसागर को पार करेगा, क्योंकि नाम के प्रभाव से भवसागर सूख जाता है, भगवान के चरणों में विनय- भाव उत्पन्न हो जाए भगवान के चरणों में सच्ची- लगन की गांठ पड़ जाए अर्थात भाव ही भाई है उसी में विश्वास जम जाता है दर्शन स्पर्श पाते ही सदा के लिए उसी में रम जाता है साधना की इस कसौटी पर सम+आदि= समाधि, प्रारंभ और अंत के साथ समत्व प्राप्त हो गया और अपने इष्ट को हृदय में प्रत्यक्ष धारण करके भगवान के धाम में प्रवेश कर जाता है। इसी भाव से भगवान वशीभूत होकर राजा के पकवान को त्याग कर सूपा- भगत की कढ़ी को भगवान ने चखा।
परम पूज्य स्वामी जी ने सत्संग में कहा कि एक ही नाम को चार श्रेणी में जपा जाता है। वह बैखरी, मध्यमा, पश्यंति और परा। तत्वदर्शी महापुरुष के सानिध्य में भगवान की टूटी -फूटी सेवा सत्संग से बैखरी की शुरुआत होती है मध्यमा-धीमे -धीमे कंठ से उतार-चढ़ाव और मन को खड़ा भर कर दो, उन्नति होने पर, पश्यंति-श्वास कब आई और क्या कहा ,कितनी देर रुकी, कितने सेकंड ,प्रतीक्षा करो ,जब नाम आए तो ओम शब्द ढाल दो अर्थात अविनाशी परमपिता जिसका निवास स्थान से देश में स्थित है और जब यह स्वास में ढल जाए तथा अन्य संकल्पों का क्रम टूट जाए तब परा-अर्थात बीच में दूसरा संकल्प ना प्रवेश कर सके ऐसा व्यक्ति इस भवसागर रुपी, सांसारिक बंधनों को त्याग कर योगक्षेम को प्राप्त होता है। परमहंस आश्रम शक्तेशगढ़ में गोरखपुर से आए हुए संत प्रभा शंकर महाराज इस आश्रम के वरिष्ठ संत नारद महाराज, तानसेन महाराज, प्रदीप यादव समेत भक्तगण उपस्थित रहे।