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महर्षि विश्वकर्मा जगत के सर्वप्रथम शिल्पाचार्य एवं आचार्यों के कहलाएं आचार्य

महान ऋषि और ब्रह्मज्ञानी भगवान विश्वकर्मा की जयंती कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। महर्षि विश्वकर्मा जगत के सर्वप्रथम शिल्पाचार्य एवं आचार्यों के आचार्य कहलाए। वह निर्माण और सृजन के देवता हैं। उनकी पूजा जन कल्याणकारी है। प्रत्येक प्राणी को उन्नति की कामना के साथ भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना अवश्य करना चाहिए। भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के अभ‍ियंता के रूप में जाना जाता है। उनकी आराधना कर अच्छे उत्पादन की विनती की जाती है।
भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए घर, नगर, अस्त्र-शस्त्र आदि का निर्माण किया। चार युगों में उन्होंने कई नगर और भवनों का निर्माण किया। सतयुग में स्वर्गलोक का निर्माण किया। त्रेता युग में लंका का, द्वापर में द्वारका और कलियुग के आरंभ के पूर्व हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया। भगवान विश्वकर्मा ने ही जगन्नाथ पुरी के जगन्नाथ मंदिर में स्थित विशाल मूर्तियों का निर्माण किया। भगवान विश्‍वकर्मा ने कर्ण का कुंडल, भगवान श्रीहरि विष्णु का सुदर्शन चक्र, पुष्पक विमान, भगवान शिवशंकर का त्रिशूल, यमराज का कालदंड आदि का निर्माण किया। ऋषि दधिचि की अस्थियों से उन्होंने दिव्यास्त्रों का निर्माण किया। स्वर्ग के अधिपति देवराज इंद्र के लिए भी महाशक्तिशाली वज्र का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही किया। स्वर्ग लोक से लेकर भगवान श्रीकृष्ण के द्वारकाधीश के रचयिता भगवान विश्वकर्मा ही हैं। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की आराधना से सुख-समृद्धि और धन-धान्य का आगमन होता है।
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।