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पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण रहते हैं प्रसन्न

पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण प्रसन्न रहते हैं। 15 दिन चलने वाले पितृ पक्ष में पूर्वजों के लिए पिंडदान कर्म, तर्पण और दान किया जाता है। ब्राह्मण भोज कराया जाता है। शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन में तीन ऋण मुख्य हैं। ये हैं देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। इन ऋण का उतारा जाना जरूरी होता है।
प्रत्येक गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति पर पितृ दोष है तो उसे जीवन में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में पितृ दोष को दूर करना जरूरी हो जाता है। श्राद्ध पक्ष के दिनों में तर्पण आदि कर्म करना और पूर्वजों के प्रति मन में श्रद्धाभाव रखना चाहिए। अमावस्या के दिन गरीबों को वस्त्र और अन्न दान करना पितृदोष से मुक्ति का उपाय है। गाय की सेवा करना भी पितृदोष से मुक्ति का उपाय है। जब भी घर से बाहर जाएं तो पितरों का आशीर्वाद लेकर निकलें। क्रोध छोड़कर परिवार में परस्पर प्रेम की स्थापना करें। श्रीमद्‍भागवत गीता का पाठ कराएं। कुल परंपरा का पालन करें। अमावस्या को जरूरतमंदों को भोजन कराएं। भोजन में खीर जरूर बनाएं। सुबह-शाम सामूहिक आरती करें। घर में हमेशा चंदन और कर्पूर की खुशबू का प्रयोग करें। एकादशी के दिन व्रत रखें। प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें। श्राद्ध पक्ष में पंचबली भोग लगाएं। पंचबली भोग में गाय, कौआ, कुत्ता, देव और चींटी आते हैं। श्राद्ध के दिनों में 15 दिनों तक लगातार कौवों को खाना खिलाना चाहिए। माना जाता है कि पूर्वज कौवों के रूप में धरती पर आते हैं। पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों के निधन की तिथि पर ब्राह्मणों या जरूरतमंदों का भोजन कराएं। पूर्वजों की पसंद का भोजन हो और अपने हाथों से बनाया गया हो। पीपल और बरगद की नियमित पूजा करें। पितरों से अपनी गलती की क्षमा मांगें। जब भी घर से बाहर जाएं तो पितरों का आशीर्वाद लेकर निकलें।
नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।